Tuesday, September 13, 2011
बेटा / बेटी

अगर बेटा वारस है,तो बेटी पारस है l
अगर बेटा वंश है,तो बेटी अंश है l
अगर बेटा आन है,तो बेटी शान है l
अगर बेटा तन है,तो बेटी मन है l
अगर बेटा मान है,तो बेटी गुमान है l
अगर बेटा संस्कार,तो बेटी संस्कृति है l
अगर बेटा आग है,तो बेटी बाग़ है l
अगर बेटा दवा है,तो बेटी दुआ है l
अगर बेटा भाग्य है,तो बेटी विधाता है l
अगर बेटा शब्द है,तो बेटी अर्थ है l
अगर बेटा गीत है,तो बेटी संगीत है l
अगर बेटा प्रेम है,तो बेटी पूजा है l

Tuesday, August 9, 2011
Saturday, August 6, 2011
जीवन क्या है

ग़ज़ल क्या है, दर्द के समंदर में उतरकर देखो
शेर क्या है, किसी के गम में तडपकर देखो
जिंदगी क्या है, जान जाओगे दु:ख सहकर यारों
खुशी क्या है, इस जहां में तुम दिल लगाकर देखो
राग क्या है, मन की झील में नहाकर देखो
संगीत क्या है, सूरों को दिल में सजाकर देखो
जादू क्या है, जान जाओगे लय में डूबकर देखो
नशा क्या है, आत्मा संग दिल से गाकर देखो
भजन क्या है, प्रभु के शरण में समाकर देखो
सत्संग क्या है, गुरु के वचनों को अपनाकर देखो
बदल जायेगी दु:खों की दुनिया शांति पाओगे यारों
प्रभु की भक्ति में मन को तुम डूबाकर देखो
जीवन क्या है किसी दु:खी को तुम अपनाकर देखो
खुशी क्या है किसी के तुम काम आकर देखो
सुख मिलता है कैसे जीवनभर न समझ पाया कोई
किसी के गम में खुद को तुम लूटाकर देखो
मैत्री दिवस

मैत्री दिवस पर अपने सब मित्रों के नाम , जिनके बिना यह जीवन निरर्थक होता, मै दो महाकवियों गोस्वामी तुलसी दास और राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की रचना उद्धृत कर रहा हूं :
१. राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर रचित रश्मि रथी से जहां श्री कृष्ण से संवाद के दौरान कर्ण के मुख से कवि ने मैत्री का अति सुन्दर बखान किया है :
मैत्री की बड़ी सुखद छाया,
शीतल हो जाती है काया,
धिक्कार योग्य होगा वह नर ,
जो पाकर भी ऐसा तरुवर,
हो अलग खड़ा कटवाता है ,
खुद आप नहीं कट जाता है ।
जिस नर की बाँह गही मैने,
जिस तरु की छाँह गही मैने,
उस पर न वार चलने दूंगा,
कैसे कुठार चलने दूंगा ?
जीते जी उसे बचाउंगा,
या आप स्वयं कट जाउंगा ।
मित्रता बड़ा अनमोल रतन,
कब इसे तोल सकता है धन ?
धरती की है क्या बिसात ?
आ जाय अगर बैकुंठ हाथ,
उसको भी न्योवछवर कर दूं,
कुरुपति के चरणों मे धर दूं ।
शीतल हो जाती है काया,
धिक्कार योग्य होगा वह नर ,
जो पाकर भी ऐसा तरुवर,
हो अलग खड़ा कटवाता है ,
खुद आप नहीं कट जाता है ।
जिस नर की बाँह गही मैने,
जिस तरु की छाँह गही मैने,
उस पर न वार चलने दूंगा,
कैसे कुठार चलने दूंगा ?
जीते जी उसे बचाउंगा,
या आप स्वयं कट जाउंगा ।
मित्रता बड़ा अनमोल रतन,
कब इसे तोल सकता है धन ?
धरती की है क्या बिसात ?
आ जाय अगर बैकुंठ हाथ,
उसको भी न्योवछवर कर दूं,
कुरुपति के चरणों मे धर दूं ।
२. गोस्वामी तुलसी दास कृत श्री राम चरित मानस के किष्किन्धा काण्ड से जहां श्री राम संवाद के दौरान सुग्रीव को अपनी मित्रता का भरोसा दिलाते हुए मित्र के गुणों का अति सुन्दर बखान कर रहे हैं :
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी,
तिन्हही बिलोकत पातक भारी।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना,
मित्र क दुख रज मेरु समाना ।
जिन्हके अस मति सहज न आई ,
ते सठ कत हठि करत मिताई ।
कुपंथ निवारि सुपंथ चलावा ,
गुन प्रकटै अवगुनहिं दुरावा ।
देत लेत मन संक न धरई ,
बल अनुमानि सदा हित करई ।
बिपत काल कर सतगुन नेहा ,
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ।
आगे कह हित वचन बनाई ,
पीछे अनहित मन कुटिलाई ।
जाके चित एहि गति सम भाई ,
अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई ।
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी ,
कपटी मित्र सूल सम चारी ।
सखा सोच त्यागहु बल मोरे ,
सब बिधि घटब काज मैं तोरे ।

मैत्री दिवस पर सबको हार्दिक शुभकामनाएं ।
तिन्हही बिलोकत पातक भारी।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना,
मित्र क दुख रज मेरु समाना ।
जिन्हके अस मति सहज न आई ,
ते सठ कत हठि करत मिताई ।
कुपंथ निवारि सुपंथ चलावा ,
गुन प्रकटै अवगुनहिं दुरावा ।
देत लेत मन संक न धरई ,
बल अनुमानि सदा हित करई ।
बिपत काल कर सतगुन नेहा ,
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ।
आगे कह हित वचन बनाई ,
पीछे अनहित मन कुटिलाई ।
जाके चित एहि गति सम भाई ,
अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई ।
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी ,
कपटी मित्र सूल सम चारी ।
सखा सोच त्यागहु बल मोरे ,
सब बिधि घटब काज मैं तोरे ।

मैत्री दिवस पर सबको हार्दिक शुभकामनाएं ।
Tuesday, July 26, 2011
तुलसी अपने राम को.......
तुलसी अपने राम को, भजन करौ निरसंक
आदि अन्त निरबाहिवो जैसे नौ को अंक ।।
आवत ही हर्षे नही नैनन नही सनेह!
तुलसी तहां न जाइए कंचन बरसे मेह!!
तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहु ओर!
बसीकरण एक मंत्र है परिहरु बचन कठोर!!
बिना तेज के पुरूष अवशी अवज्ञा होय!
आगि बुझे ज्यों रख की आप छुवे सब कोय!!
तुलसी साथी विपत्ति के विद्या, विनय, विवेक!
साहस सुकृति सुसत्याव्रत राम भरोसे एक!!
काम क्रोध मद लोभ की जो लौ मन मैं खान!
तौ लौ पंडित मूरखों तुलसी एक समान!!
राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार!
तुलसी भीतर बहारों जौ चाह्सी उजियार!!
नाम राम को अंक है , सब साधन है सून!
अंक गए कछु हाथ नही, अंक रहे दस गून!!
प्रभु तरु पर, कपि डार पर ते, आपु समान!
तुलसी कहूँ न राम से, साहिब सील निदान!!
हरे चरहिं, तापाहं बरे, फरें पसारही हाथ!
तुलसी स्वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ!!
तुलसी हरि अपमान तें होई अकाज समाज!
राज करत रज मिली गए सकल सकुल कुरुराज!!
राम दूरि माया बढ़ती , घटती जानि मन मांह !
भूरी होती रबि दूरि लखि सिर पर पगतर छांह !!
राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि!
राग न रोष न दोष दुःख सुलभ पदारथ चारी!!
चित्रकूट के घाट पर भई संतान की भीर !
तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुबीर!!
तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए!
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए!!
नीच निचाई नही तजई, सज्जनहू के संग!
तुलसी चंदन बिटप बसि, बिनु बिष भय न भुजंग !!
ब्रह्मज्ञान बिनु नारि नर कहहीं न दूसरी बात!
कौड़ी लागी लोभ बस करहिं बिप्र गुर बात !!
फोरहीं सिल लोढा, सदन लागें अदुक पहार !
कायर, क्रूर , कपूत, कलि घर घर सहस अहार !!
तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन!
अब तो दादुर बोलिहं हमें पूछिह कौन!!
मनि मानेक महेंगे किए सहेंगे तृण, जल, नाज!
तुलसी एते जानिए राम गरीब नेवाज!!
होई भले के अनभलो,होई दानी के सूम!
होई कपूत सपूत के ज्यों पावक मैं धूम!!..
Friday, July 15, 2011
क्या सिखाता है सावन का महीना ?
सावन के मिजाज में कई बातें हैं जो हमें जीवन की परिस्थितियों से जूझने और सुधारने का मौका देती हैं। पहले हम समझें कि सावन क्या है? कहते हैं आषाढ़ का महीना बारिश का आगाज होता है, सावन की रिमझिम हमारे शरीर को गरमी से हुए नुकसान से उबारती है और फिर भादौ की झमाझम बारिश धरती की भीतर की उष्मा को खत्म कर देती है। सावन का महीना हमें जीवन प्रबंधन के कई सूत्र बता रहा है, जानिए ये क्या हैं:-
- सावन रिमझिम फुहारों का महीना है। आसमान पर दिनभर छाई रहने वाली घटाएं धीरे-धीरे बरसती हैं। यह हमें सिखाती है कि जीवन में हम जब भी किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए निकलें, हमारी गति शुरुआत में धीमी रहे, ताकि हम अपनी योजना के हर पहलू को देखते हुए कोई कदम उठा सकें।
- सावन में अधिकांश समय आसमान पर बादल रहते हैं, लेकिन बरसते कभी-कभी ही हैं। यह सिखाते हैं कि हमें अपने जीवन में किसी भी चुनौती के लिए हर वक्त तैयार रहना चाहिए, ताकि समय आने पर हमें तैयारियों में देर न लगे।
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